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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सप्तर्चेभ्यः) सात [दो कान, दो नथने, दो आँखें और एक मुख-अथर्व०१०।२।६ इनकी] स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥४॥
टिप्पणी: ४−(सप्तर्चेभ्यः) म०१। कः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्-अथर्व०१०।२।६। इत्येतेषां स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः ॥
