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ए॑कानृ॒चेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

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पद पाठ

एकऽअनृचेभ्यः। स्वाहा ॥२३.२२॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:22


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एकानृचेभ्यः) एक [परमात्मा] की अत्यन्त ही स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥२२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥२२॥
टिप्पणी: २२−(एकानृचेभ्यः) म०१। नास्ति ऋक् स्तुत्या विद्या यस्याः सकाशादिति अनृचः। एकस्य परमेश्वरस्य अतिशयेन स्तुत्यविद्यायुक्तेभ्यो वेदेभ्यः ॥