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प॑ञ्च॒र्चेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पञ्चऽऋचेभ्यः। स्वाहा ॥२३.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्चर्चेभ्यः) पाँच [पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश पाँच तत्त्वों] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥२॥
टिप्पणी: २−(पञ्चर्चेभ्यः) म०१। पञ्चानां पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः ॥