0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अष्टादशर्चेभ्यः) अठारह [धैर्य, सहन, मन का रोकना, चोरी न करना, शुद्धता, जितेन्द्रियता, बुद्धि, विद्या, सत्य, क्रोध न करना, ये दस धर्म-मनु०६।९२, तथा ब्राह्मण, गौ, अग्नि, सुवर्ण, घृत, सूर्य, जल, राजा ये आठ मङ्गल-शब्दकल्पद्रुमकोश, इन अठारह] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥१५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(अष्टादशर्चेभ्यः) म०१। धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्-मनु०६।९२। लोकेऽस्मिन् मङ्गलान्यष्टौ ब्राह्मणो गौर्हुताशनः। हिरण्यं सर्पिरादित्य आपो राजा तथाऽष्टमः ॥१॥ इति शब्दकल्पद्रुमकोशः। एतेषामष्टादशानां स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः ॥
