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स॑प्तदश॒र्चेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

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पद पाठ

सप्तदशऽऋचेभ्यः। स्वाहा ॥२३.१४॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:14


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सप्तदशर्चेभ्यः) सत्तरह [चार दिशा, चार विदिशा, एक ऊपर की और एक नीचे की दस दिशायें−सत्त्व रज, और तम तीन गुण, ईश्वर, जीव, प्रकृति और संसार] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥१४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(सप्तदशर्चेभ्यः) म०१। चतस्रो दिशाश्चतस्रो मध्यदिशा एकोपरिस्था, एकाधोभवेति दश दिशाः, सत्त्वरजस्तमांसि त्रयो गुणाः, ईश्वरो जीवः प्रकृतिः संसारश्चेति सप्तदशानां स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः ॥