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प॑ञ्चदश॒र्चेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

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पद पाठ

पञ्चदशऽऋचेभ्यः। स्वाहा ॥२३.१२॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:12


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्चदशर्चेभ्यः) पन्द्रह [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, चित्र ये सात रूप, तथा मधुर, अम्ल, कटु, कषाय, तिक्त ये छह रस और सुरभि, असुरभि दो प्रकार का गन्ध, इन पन्द्रह] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(पञ्चदशर्चेभ्यः) म०१। शुक्लनीलपीतरक्तहरितकपिशचित्रसप्तरूपाणि, मधुराम्ललवणकटुकषायतिक्त-षड्रसाः, सुरभिश्चासुरभिश्चेति गन्धौ। इत्येतेषां पञ्चदशानां स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः ॥