0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (चतुर्दशर्चेभ्यः) चौदह [कान, आँख, नासिका, जिह्वा, त्वचा−पाँच, ज्ञानेन्द्रिय, और वाक्, हाथ, पाँव, पायु, उपस्थ−पाँच कर्मेन्द्रिय, तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥११॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥११॥
टिप्पणी: ११−(चतुर्दशर्चेभ्यः) म०१। मनोबुद्धिचित्ताहङ्कारसहितानां दशेन्द्रियाणां स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः ॥
