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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आथर्वणानाम्) अथर्वा [निश्चल ब्रह्म] के बताये ज्ञानों के (चतुर्ऋचेभ्यः) चार [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥१॥
टिप्पणी: यही भावार्थ आगे मन्त्र २९ तक समझें औरनिश्चल ब्रह्म के बताये ज्ञानों के-इन पदों की अनुवृत्ति जानें ॥१−(आथर्वणानाम्) अथर्वन्-अण्। अथर्वणा निश्चलब्रह्मणा प्रोक्तानां ज्ञानानाम् (चतुर्ऋचेभ्यः) ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे। पा०५।४।७४। इति चतुर्+ऋच्-अप्रत्ययः समासान्तः। ऋच स्तुतौ-क्विप्। ऋग्वाङ्नाम-निघ०१।११। चतुर्णां धर्मार्थकाममोक्षाणाम् ऋक्स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः (स्वाहा) अ०१९।१७।१। सुवाणी ॥
