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आ॑ङ्गिर॒साना॑मा॒द्यैः पञ्चा॑नुवा॒कैः स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आङ्गिरसानाम्। आद्यैः। पञ्च। अनुऽवाकैः। स्वाहा ॥२२.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:22» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

महाशान्ति के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (आङ्गिरसानाम्) अङ्गिरा [सर्वज्ञ परमेश्वर] के बनाये [ज्ञानों] के (पञ्च) पाँच [पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश पञ्चभूतों] से सम्बन्धवाले (आद्यैः) आदि में [इस सृष्टि के पहिले] वर्तमान (अनुवाकैः) अनुकूल वेदवाक्यों के साथ (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वरीय ज्ञान वेदों द्वारा पृथिवी आदि पदार्थों को यथावत् जानकर अपनी वाणी को सुफल करें ॥१॥
टिप्पणी: १−(आङ्गिरसानाम्) अङ्गिरस्-अण्। अङ्गिरसा सर्वज्ञेन परमात्मना कृतानां ज्ञानानाम् (आद्यैः) सृष्टेः प्राग् वर्तमानैः (पञ्च) विभक्तेर्लुक्। पञ्चभिः पृथिव्यादिपञ्चभूतसम्बन्धिभिः (अनुवाकैः) अनुकूलवेदवाक्यैः सह (स्वाहा) अ०१९।१७।१। सुवाणी ॥