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शं त॒ आपो॑ धन्व॒न्याः॒ शं ते॑ सन्त्वनू॒प्याः॑। शं ते॑ खनि॒त्रिमा॒ आपः॒ शं याः कु॒म्भेभि॒राभृ॑ताः ॥
पद पाठ
शम्। ते। आपः। धन्वन्याः। शम्। ते। सन्तु। अनूप्याः। शम्। ते। खनित्रिमाः। आपः। शम्। याः। कुम्भेभिः। आऽभृताः ॥२.२॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:2
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जल के उपकार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (ते) तेरे लिये (धन्वन्याः) निर्जल देश के (आपः) जल (शम्) सुखदायक, और (ते) तेरे लिये (अनूप्याः) सजल स्थान के [जल] (शम्) सुखदायक (सन्तु) होवें। (ते) तेरे लिये (खनित्रिमाः) खनती वा फावड़े से निकाले गये (आपः) जल (शम्) सुखदायक [होवें] और (याः) जो [जल] (कुम्भेभिः) घड़ों से (आभृताः) लाये गये हैं, वे भी (शम्) सुखदायक [होवें] ॥२॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान है ॥२॥
टिप्पणी: यह मन्त्र कुछ भेद से आ चुका है-अ० १।६।४ ॥ २−(शम्) सुखकारिण्यः (ते) तुभ्यम् (आपः) जलानि (धन्वन्याः) अ० १।६।४। धन्वन्−यत्। धन्वनि निर्जलदेशे भवाः (शम्) (ते) (सन्तु) (अनूप्याः) अ० १।६।४। अनूपे सजले देशे भवाः (शम्) (ते) (खनित्रिमाः) अ० १।६।४। खनित्रेण खननसाधनेन निर्वृत्ताः (आपः) (शम्) (याः) (कुम्भेभिः) घटैः (आभृताः) आहृताः। आनीताः ॥
