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इन्द्रो॑ वी॒र्ये॒णोद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥
पद पाठ
इन्द्रः। वीर्येण। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.९॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:9
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवान् पुरुष] (वीर्येण) वीरता से (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति........... [मन्त्र १] ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वर की भक्ति के साथ प्रतापी वीरों के समान वीर कर्म करके उन्नति करनी चाहिये ॥९॥
टिप्पणी: ९−(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् पुरुषः (वीर्येण) वीरकर्मणा। अन्यद् गतम् ॥
