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ब्रह्म॑ ब्रह्मचा॒रिभि॒रुद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ब्रह्म। ब्रह्मचारिऽभिः। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:8


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्म) वेदज्ञान (ब्रह्मचारिभिः) ब्रह्मचारियों [वीर्यनिग्रह से ईश्वर और वेद को प्राप्त होनेवालों] के साथ (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति......[मन्त्र १] ॥८॥
भावार्थभाषाः - जैसे ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य के उत्तम नियमों के पालन से संसार का उपकार करते हैं, वैसे ही सब मनुष्यों को करना चाहिये ॥८॥
टिप्पणी: ८−(ब्रह्म) वेदज्ञानम् (ब्रह्मचारिभिः) वीर्यनिग्रहेण परमेश्वरस्य वेदस्य च प्राप्तये अभ्यासिभिः। अन्यद् गतम् ॥