वांछित मन्त्र चुनें
142 बार पढ़ा गया

स॑मु॒द्रो न॒दीभि॒रुद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

समुद्रः। नदीभिः। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.७॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:7


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (समुद्रः) समुद्र [जलसमूह] (नदीभिः) नदियों के साथ (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति....... [मन्त्र १] ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे समुद्र ईश्वरनियम से नदियों के मेल से बड़ा होता है, वैसे ही मनुष्य मिलकर उन्नति करें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(समुद्रः) जलौघः (नदीभिः)। सरिद्भिः। अन्यद् गतम् ॥