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य॒ज्ञो दक्षि॑णाभि॒रुद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥
पद पाठ
यज्ञः। दक्षिणाभिः। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.६॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:6
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञः) यज्ञ [पूजनीय व्यवहार] (दक्षिणाभिः) दक्षिणाओं [योग्य दानों] के साथ (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति..... [मन्त्र १] ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम-उत्तम काम सुपात्रों के सत्कार से सिद्ध होते हैं, वैसे ही मनुष्यों को ईश्वरभक्ति के साथ लोगों का मान करके बड़े-बड़े काम करने चाहिए ॥६॥
टिप्पणी: ६−(यज्ञः) पूजनीयव्यवहारः (दक्षिणाभिः) योग्यदानैः। अन्यद् गतम् ॥
