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सोम॒ ओष॑धीभि॒रुद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥
पद पाठ
सोमः। ओषधीभिः। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.५॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:5
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सोमरस (ओषधीभिः) ओषधियों [अन्नादि] के साथ (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति....... [म०१] ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे सोमरस उत्तम महौषध दूसरी ओषधियों के साथ में उपकारी होता है, वैसे ही परमेश्वरभक्त विद्वान् पुरुष अन्य मनुष्यों के मेल से उपकार करे ॥५॥
टिप्पणी: ५−(सोमः) सोमरसः (ओषधीभिः) अन्नादिभिः। अन्यद् गतम् ॥
