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च॒न्द्रमा॒ नक्ष॑त्रै॒रुद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

चन्द्रमाः। नक्षत्रैः। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्।आ।विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:4


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (चन्द्रमाः) चन्द्रमा (नक्षत्रैः) नक्षत्रों के साथ (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति...... [मन्त्र १] ॥४॥
भावार्थभाषाः - चन्द्रमा और नक्षत्रों के विषय में सू०७ और सूक्त ८ मन्त्र १, २ देखो। मनुष्य चन्द्रमा के समान परमात्मा के नियम में चलकर परोपकार करे ॥४॥
टिप्पणी: ४−(चन्द्रमाः) चन्द्रमाह्लादं माति निर्मिमीते सः। आह्लादकश्चन्द्रलोकः (नक्षत्रैः) गमनशीलैस्तारागणैः पश्यत। सूक्तम् ७ तथा ८ म०१, २। अन्यद् गतम् ॥