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सूर्यो॑ दि॒वोद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सूर्यः। दिवा। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:3


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्यः) सूर्य (दिवा) प्रकाश के साथ (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति.....[मन्त्र १] ॥३
भावार्थभाषाः - मनुष्य सूर्य के समान प्रतापी होकर परमात्मा का स्मरण करता हुआ पुरुषार्थ करे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(सूर्यः) रविः (दिवा) प्रकाशेन सह। अन्यद् गतम् ॥