131 बार पढ़ा गया
वा॒युर॒न्तरि॑क्षे॒णोद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥
पद पाठ
वायुः। अन्तरिक्षेण। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.२॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:2
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वायुः) वायु [पवन] (अन्तरिक्षेण) आकाश के साथ (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति...... [मन्त्र १] ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे वायु आकाश में होकर प्रत्येक वस्तु में प्रवेश करके आगे बढ़ता जाता है, वैसे ही मनुष्य परमेश्वर में श्रद्धा करके विद्या और बल में आगे बढ़ें ॥२॥
टिप्पणी: २−(वायुः) वातः। पवनः (अन्तरिक्षेण) आकाशेन। अन्यद् गतम् ॥
