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प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाभि॒रुद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रजाऽपतिः। प्रऽजाभिः। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:11


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रजापतिः) प्रजापति [प्रजापालक मनुष्य] (प्रजाभिः) प्रजाओं के साथ (उत् अक्रामत्) ऊँचा चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति की ओर (वः) तुम्हें (प्र) आगे (नयामि) लिये चलता हूँ। (ताम्) उस [शक्ति] में (आ विशत) तुम घुस जाओ, (ताम्) उसमें (प्र विशत) तुम भीतर जाओ, (सा) वह [शक्ति] (वः) तुम्हें (शर्म) सुख (च च) और (वर्म) कवच [रक्षासाधन] (यच्छतु) देवे ॥११॥
भावार्थभाषाः - प्रजापालक पुरुष उत्तम सन्तानों और जनताओं के साथ आगे बढ़ते हैं, वैसे ही सब मनुष्यों को परस्पर सहाय करके सबकी उन्नति से अपनी उन्नति करनी चाहिये ॥११॥
टिप्पणी: ११−(प्रजापतिः) प्रजापालकः पुरुष (प्रजाभिः) सन्तानैः। जनताभिः। अन्यद् गतम् ॥