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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) (वे) [दुष्ट] (प्रजननवन्तम्) सृजन सामार्थ्य के स्वामी (प्रजापतिम्) प्रजापति [प्रजाओं के पालक परमेश्वर] की (ऋच्छन्तु) सेवा करें। (ये) जो (अघायवः) बुरा चीतनेवाले (मा) मुझे (ध्रुवायाः) स्थिर वा नीचेवाली (दिशः) दिशा से (अभिदासात्) सताया करें ॥९॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान है ॥९॥
टिप्पणी: ९−(प्रजापतिम्) सर्वपालकं परमात्मानम् (प्रजननवन्तम्) सृजनसामर्थ्यस्वामिनम् (ध्रुवायाः) स्थिरायाः। अधःस्थितायाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
