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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) वे [दुष्ट] (मरुत्वन्तम्) शूरों के स्वामी (इन्द्रम्) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवान् परमात्मा] की (ऋच्छन्तु) सेवा करें। (ये) जो (अघायवः) बुरा चीतनेवाले (मा) मुझे (एतस्याः) इस [बीचवाली] (दिशः) दिशा से (अभिदासात्) सताया करें ॥८॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान है ॥८॥
टिप्पणी: ८−(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (मरुत्वन्तम्) मरुतां शत्रुमारकाणां शूराणां स्वामिनम्। अन्यत् पूर्ववत्॥
