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अ॒पस्त ओष॑धीमतीरृच्छन्तु। ये मा॑ऽघा॒यव॑ ए॒तस्या॑ दि॒शोऽभि॒दासा॑त् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अपः। ते। ओषधीऽमतीः। ऋच्छन्तु। ये। मा। अघऽयवः। एतस्याः। दिशः। अभिऽदासात् ॥१८.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:18» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) वे [दुष्ट] (ओषधीमतीः) ओषधियों [अन्न सोमलता आदि] वाली (अपः) श्रेष्ठ गुणों में व्याप्त प्रजाओं की (ऋच्छन्तु) सेवा करें। (ये) जो (अघायवः) बुरा चीतनेवाले (मा) मुझे (एतस्याः) इस [बीचवाली] (दिशः) दिशा से (अभिदासात्) सताया करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान है ॥६॥
टिप्पणी: सूचना−(अपः) शब्द के लिये गत सूक्त का मन्त्र ६ देखो ॥६−(अपः) सू–०१७ म०६। आप्ताः प्रजाः (ओषधीमतीः) अन्नसोमलतायुक्ताः। अन्यत् पूर्ववत् ॥