0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) वे [दुष्ट] (ओषधीमतीः) ओषधियों [अन्न सोमलता आदि] वाली (अपः) श्रेष्ठ गुणों में व्याप्त प्रजाओं की (ऋच्छन्तु) सेवा करें। (ये) जो (अघायवः) बुरा चीतनेवाले (मा) मुझे (एतस्याः) इस [बीचवाली] (दिशः) दिशा से (अभिदासात्) सताया करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान है ॥६॥
टिप्पणी: सूचना−(अपः) शब्द के लिये गत सूक्त का मन्त्र ६ देखो ॥६−(अपः) सू०१७ म०६। आप्ताः प्रजाः (ओषधीमतीः) अन्नसोमलतायुक्ताः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
