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बृह॒स्पति॑र्मा॒ विश्वै॑र्दे॒वैरू॒र्ध्वाया॑ दि॒शः पा॑तु॒ तस्मि॑न्क्रमे॒ तस्मि॑ञ्छ्रये॒ तां पुरं॒ प्रैमि॑। स मा॑ रक्षतु॒ स मा॑ गोपायतु॒ तस्मा॑ आ॒त्मानं॒ परि॑ ददे॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृहस्पतिः। मा । विश्वैः। देवैः। ऊर्ध्वायाः। दिशः। पातु। तस्मिन्। क्रमे। तस्मिन्। श्रये। ताम्। पुरम्। प्र।‍ एमि। सः। मा। रक्षतु। सः। मा। गोपायतु। तस्मै। आत्मानम्। परि। ददे। स्वाहा ॥१७.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:17» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रक्षा करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़ी वेदवाणी का रक्षक परमात्मा] (विश्वैः) सब (देवैः) उत्तम गुणों के साथ (मा) मुझे (ऊर्ध्वायाः) ऊपरवाली (दिशः) दिशा से (पातु) बचावे, (तस्मिन्) उसमें [उस परमेश्वर के विश्वास में] (क्रमे) मैं पद बढ़ाता हूँ, (तस्मिन्) उसमें (श्रये) आश्रय लेता हूँ, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति [वा दुर्गरूप परमेश्वर] को (प्र) अच्छे प्रकार (एमि) प्राप्त होता हूँ। (सः) वह [ज्ञानस्वरूप परमेश्वर] (मा) मुझे (रक्षतु) बचावे, (सः) वह (मा) मुझे (गोपायतु) पाले, (तस्मै) उसको (आत्मानम्) अपना आत्मा [मन-सहित देह और जीव] (स्वाहा) सुन्दर वाणी [दृढ़ प्रतिज्ञा] के साथ (परि ददे) मैं सौंपता हूँ ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान है ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(बृहस्पतिः) बृहत्या वेदवाण्या रक्षकः परमात्मा (विश्वैः) सर्वैः (देवैः) श्रेष्ठगुणैः सह (ऊर्ध्वायाः) उपरिस्थितायाः। शिष्टं पूर्ववत् ॥