इ॒दमु॒च्छ्रेयो॑ऽव॒सान॒मागां॑ शि॒वे मे॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑भूताम्। अ॑सप॒त्नाः प्र॒दिशो॑ मे भवन्तु॒ न वै त्वा॑ द्विष्मो॒ अभ॑यं नो अस्तु ॥
पद पाठ
इदम्। उत्ऽश्रेयः। अवऽसानम्। आ। अगाम्। शिवे इति। मे। द्यावापृथिवी इति। अभूताम्। असपत्नाः। प्रऽदिशः। मे। भवन्तु। न। वै। त्वा। द्विष्मः। अभयम्। नः। अस्तु ॥१४.१॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:14» पर्यायः:0» मन्त्र:1
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विजयप्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे इन्द्र ! महाप्रतापी राजन्] (इदम्) यह (उच्छ्रेयः) अत्युत्तम (अवसानम्) विश्राम (आ अगाम्) मैंने पाया है, (द्यावापृथिवी) सूर्य और पृथिवी (मे) मेरे लिये (शिवे) मङ्गलकारी (अभूताम्) हुई हैं (मे) मेरी (प्रदिशः) दिशाएँ (असपत्नाः) विना शत्रु (भवन्तु) होवें, (त्वा) तुझसे (वै) निश्चय करके (न द्विष्मः) हम विरोध नहीं करते, (नः) हमारे लिये (अभयम्) अभय (अस्तु) होवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - जिस राज्य में प्रजा को सुख मिले, सूर्य और पृथिवी मङ्गलकारी हों अर्थात् जहाँ वृष्टि और अन्न आदि की उपज ठीक होती हो, वहाँ प्रजागण चोर उचक्के आदि दुष्टों से रक्षित रहकर राजभक्ति करते रहें ॥१॥
टिप्पणी: १−(इदम्) (उच्छ्रेयः) प्रशस्यतरम् (अवसानम्) विरामम्। विश्रामम् (आ अगाम्) प्राप्तवानस्मि (शिवे) मङ्गलप्रदे (मे) मह्यम् (द्यावापृथिवी) सूर्यभूमी (अभूताम्) (असपत्नाः) शत्रुरहिताः (प्रदिशः) सर्वा दिशाः (मे) मम (भवन्तु) (न) निषेधे (वै) निश्चयेन (त्वा) त्वाम् (द्विष्मः) विरोधयामः (अभयम्) भयराहित्यम् (नः) अस्मभ्यम् (अस्तु) ॥
