तद॑स्तु मित्रावरुणा॒ तद॑ग्ने॒ शं योर॒स्मभ्य॑मि॒दम॑स्तु श॒स्तम्। अ॑शी॒महि॑ गा॒धमु॒त प्र॑ति॒ष्ठां नमो॑ दि॒वे बृ॑ह॒ते साद॑नाय ॥
पद पाठ
तत्। अस्तु। मित्रावरुणा। तत्। अग्ने। शम्। योः। अस्मभ्यम्। इदम्। अस्तु। शस्तम्। अशीमहि। गाधम्। उत। प्रतिऽस्थाम्। नमः। दिवे। बृहते। सदनाय ॥११.६॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:6
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
इष्ट की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मित्रावरुणा) हे स्नेही और श्रेष्ठ माता-पिता ! दोनों और (अग्ने) हे विद्वान् आचार्य ! (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (तत्) यही (शम्) शान्तिदायक [रोगनाशक], (तत्) यही (योः) भयनिवारक (अस्तु) होवे और (इदम्) यही (शस्तम्) बड़ाई योग्य (अस्तु) होवे। [कि] (गाधम्) गम्भीरता, (प्रतिष्ठाम्) प्रतिष्ठा [गौरव] (उत) और (नमः) सत्कार को (दिवे) कामनायोग्य (बृहते) विशाल (सदनाय) स्थान के लिये (अशीमहि) हम पावें ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य माता, पिता और आचार्य आदि विद्वानों की सेवा से उत्तम गुण प्राप्त करके संसार में गम्भीर, प्रतिष्ठित और आदरयोग्य होकर उच्च पद पावें ॥६॥
टिप्पणी: यह मन्त्र ऋग्वेद में है−५।४७।७ ॥ ६−(तत्) वक्ष्यमाणम् (अस्तु) (मित्रावरुणा) हे स्नेहिश्रेष्ठौ मातापितरौ (तत्) (अग्ने) हे विद्वन्नाचार्य (शम्) शान्तिकरम्। रोगनाशकम् (योः) सू० १० म० १। भयनिवारकम् (अस्मभ्यम्) (इदम्) (अस्तु) (शस्तम्) प्रशंसनीयम् (अशीमाहि) अशू व्याप्तौ-विधिलिङि विकरणस्य लुक्। अश्नुवीमहि। प्राप्नुयाम् (गाधम्) गाधृ प्रतिष्ठालिप्सयोर्ग्रन्थे च-घञ्। गाम्भीर्यम् (उत) अपि (प्रतिष्ठाम्) गौरवम् (नमः) सत्कारम् (दिवे) कमनीयाय (बृहते) महते (सदनाय) स्थानाय। अधिकाराय ॥
