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शं नो॑ अ॒ज एक॑पाद्दे॒वो अ॑स्तु॒ शमहि॑र्बु॒ध्न्यः शं स॑मु॒द्रः। शं नो॑ अ॒पां नपा॑त्पे॒रुर॑स्तु॒ शं नः॒ पृष्णि॑र्भवतु दे॒वगो॑पा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शम्। नः। अजः। एकऽपात्। देवः । अस्तु। शम्। अहिः। बुध्न्यः। शम्। समुद्रः। शम्। नः। अपाम्। नपात्। पेरुः। अस्तु। शम्। नः। पृश्निः। भवतु। देवऽगोपा ॥११.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

इष्ट की प्राप्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अजः) अजन्मा, (एकपात्) एक डगवाला [एकरस व्यापक], (देवः) प्रकाशमय परमात्मा (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक (अस्तु) हो, (अहिः) न मारनेवाला, (बुध्न्यः) मूल तत्त्वों में रहनेवाला [आदि कारण जगदीश्वर] (शम्) शान्तिदायक हो, (समुद्रः) यथावत् सींचनेवाला ईश्वर (शम्) शान्तिदायक हो। (अपाम्) प्रजाओं का (नपात्) न गिरानेवाला, (पेरुः) पार लगानेवाला (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक (अस्तु) हो, (देवगोपा) प्रकाशमय परमात्मा से रक्षा की गयी (पृश्निः) पूँछने योग्य प्रकृति [जगत्सामग्री] (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक (भवतु) हो ॥३॥
भावार्थभाषाः - जगत्पिता परमात्मा की महिमा को विचारता हुआ मनुष्य प्रकृति के संयोग को खोजकर अपनी उन्नति करे ॥३॥
टिप्पणी: मन्त्र ३-५ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−७।३५।१३-१५ ॥ ३−(शम्) शान्तिप्रदः (नः) अस्मभ्यम् (अजः) अजन्मा जगदीश्वरः (एकपात्) सर्वं जगदेकस्मिन् पादे पादगतिप्रमाणे अंशे वा यस्य सः (देवः) प्रकाशमयः परमात्मा (अस्तु) (शम्) (अहिः) आङि श्रिहनिभ्यां ह्रस्वश्च। उ० ४।१३८। इति बाहुलकात्, नञ्+हन वधे-इण्, डित्। अहन्ता। अमारकः (बुध्न्यः) बुध्नेषु तत्त्वमूलेषु विद्यमानः (शम्) (समुद्रः) समुद्र आदित्यः, समुद्र आत्मा-निरु० १४।१६। सर्वसेचकः परमात्मा (शम्) (नः) (अपाम्) प्रजानाम् (नपात्) न पातयिता। सर्वदा रक्षकः (पेरुः) मीपीभ्यां रुः। उ० ४।१०१। पीङ् पाने-रु प्रत्ययः। यद्वा पा रक्षणे-रु प्रत्ययः, आकारस्य एकारः। यद्वा पार कर्मसमाप्तौ−उ प्रत्ययः आकारस्य एकारः। पानकर्ता। रक्षकः। पारयिता (अस्तु) (शम्) (नः) (पृश्निः) प्रष्टव्या प्रकृतिः। जगत्सामग्री (भवतु) (देवगोपा) देव+गुपू रक्षणे-अच्, टाप्। देवः परमेश्वरो गोपो रक्षको यस्याः सा ॥