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शं नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्राय॑माणः॒ शं नो॑ भवन्तू॒षसो॑ विभा॒तीः। शं नः॑ प॒र्जन्यो॑ भवतु प्र॒जाभ्यः॒ शं नः॒ क्षेत्र॑स्य॒ पति॑रस्तु श॒म्भुः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शम्। नः।देवः। सविता। त्रायमाणः। शम्। नः। भवन्तु। उषसः। विऽभातीः। शम्। नः। पर्जन्यः। भवतु। प्रऽजाभ्यः। शम्। नः। क्षेत्रस्य। पतिः। अस्तु। शम्ऽभुः ॥१०.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:10


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सृष्टि के पदार्थों से उपकार लेने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (देवः) प्रकाशमान (सविता) लोकों का चलानेवाला सूर्य (त्रायमाणः) रक्षा करता हुआ (नः) हमें (शम्) सुखदायक हो, (विभातीः) जगमगाती हुई (उषसः) प्रभात वेलाएँ (नः) हमें (शम्) सुखदायक (भवन्तु) हों। (पर्जन्य) सींचनेवाला मेघ (नः) हमें और (प्रजाभ्यः) प्रजाओं के लिये (शम्) सुखदायक (भवतु) हो, (शम्भुः) मङ्गलदाता (क्षेत्रस्य) खेत का (पतिः) स्वामी (नः) हमें (शम्) सुखदायक (अस्तु) हो ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सूर्य के ताप की अनुकूलता का और मेघ से वृष्टि आदि का विचार करके खेती आदि व्यवहार करें और अन्न आदि की वृद्धि से सुखी होवें ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(शम्) शान्तिप्रदः (नः) अस्मभ्यम् (देवः) प्रकाशमानः (सविता) लोकप्रेरकः सूर्यः (त्रायमाणः) रक्षन् (शम्) (नः) (भवन्तु) (उषसः) प्रभातवेलाः (विभातीः) विभात्यः। विशेषेण दीप्यमानाः (शम्) (नः) (पर्जन्यः) पर्जन्यः। उ० ३।१०३। पृषु सेचने-अन्यप्रत्ययः, षस्य जः। वृष्टिप्रदो मेघः (भवतु) (प्रजाभ्यः) प्रजानां हिताय (शम्) (क्षेत्रस्य) क्षि ऐश्वर्ये, निवासे च-ष्ट्रन्। शस्योत्पत्तिस्थानस्य (पतिः) स्वामी (अस्तु) (शम्भुः) मङ्गलप्रदः ॥