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रू॒पंरू॑पं॒ वयो॑वयः सं॒रभ्यै॑नं॒ परि॑ ष्वजे। य॒ज्ञमि॒मं चत॑स्रः प्र॒दिशो॑ वर्धयन्तु संस्रा॒व्येण ह॒विषा॑ जुहोमि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रूपम्ऽरूपम्। वयःऽवयः। सम्ऽरभ्य। एनम्। परि। स्वजे। यज्ञम्। इमम्। चतस्रः। प्रऽदिशः। वर्धयन्तु। सम्ऽस्राव्येण। हविषा। जुहोमि ॥१.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (रूपंरूपम्) सब प्रकार की सुन्दरता और (वयोवयः) सब प्रकार के बल को (संरभ्य) ग्रहण करके (एनम्) इस (विद्वान्) को (परि ष्वजे) मैं गले लगाता हूँ। (इमम्) इस (यज्ञम्) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] को (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) बड़ी दिशाएँ (वर्धयन्तु) बढ़ावें, (संस्राव्येण) बहुत कोमलता से भरी हुई (हविषा) भक्ति के साथ [इस विद्वान् को] (जुहोमि) मैं स्वीकार करता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विद्वानों से उत्तम शिक्षा और बल प्राप्त कर के उनका सत्कार करें, जिससे सब दिशाओं में सत्कर्मों की वृद्धि होवे ॥३॥
टिप्पणी: इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध कुछ भेद से आ चुका है-अ० १।२२।३ ॥ ३−(रूपंरूपम्) अ० १।२३।३। सर्वसौन्दर्य्यम् (वयोवयः) अ० १।२२।३। सर्वसामर्थ्यम् (संरभ्य) गृहीत्वा (एनम्) विद्वांसम् (परि) सर्वतः (स्वजे) ष्वञ्ज परिष्वङ्गे। आलिङ्गयामि (यज्ञम्) (इमम्) (चतस्रः) (प्रदिशः) प्राच्यादयो महादिशः (वर्धयन्तु) समर्धयन्तु। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥