सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (जुहूः) ग्रहण [आकर्षण] करनेवाली शक्ति [परमात्मा] ने (द्याम्) प्रकाशमान सूर्य को, (उपभृत्)समीप से धारण करनेवाली [उसी] शक्ति ने (अन्तरिक्षम्) भीतर दिखाई देनेवाले आकाशको (दाधार) धारण किया है, और (ध्रुवा) [उसी] निश्चल शक्ति ने (प्रतिष्ठाम्)आश्रय स्थान, (पृथिवीम्) पृथिवी को (दाधार) धारण किया है। (इमाम्) इसी [शक्तिपरमात्मा] में (प्रति) व्याप कर (घृतपृष्ठाः) प्रकाश को ऊपर रखनेवाले [सुन्दरज्योतिवाले] (स्वर्गाः) सुख पहुँचानेवाले (लोकाः) लोक [समाज वा अधिकार] (कामंकामम्) प्रत्येक कामना को (यजमानाय) यजमान [श्रेष्ठ व्यवहार करनेवाले] केलिये (दुह्राम्) भरपूर करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा ने सूर्यको अनेक लोकों का आकर्षक, आकाश को सब लोकों का आधार और पृथिवी को प्राणियों कानिवासस्थान बनाया है, उस जगदीश्वर के आश्रय में रहकर यह सब लोक पुरुषार्थीधर्मात्मा मनुष्य के लिये बड़े ज्योतिष्मान् होकर शुभ कामनाएँ पूरी करते हैं॥५॥