सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (त्रयः) तीन [ब्रह्मजीव और प्रकृति] (सुपर्णाः) सुन्दर पालन वा पूर्तिवाले पदार्थ [अथवा सुन्दरपंखवाले पक्षियों के समान] (उपरस्य) जल के देनेवाले मेघ की (मायू) गर्जन में, (नाकस्य) लोकों के चलानेवाले सूर्य के (पृष्ठे) ऊँचे भाग पर और (विष्टपि) विविधप्रकार थाँभनेवाले आकाश में (अधि) अधिकारपूर्वक (श्रिताः) आश्रित हैं। (अमृतेन)अमर परमात्मा के साथ (विष्ठाः) विशेष करके ठहरे हुए (स्वर्गाः) सुखपहुँचानेवाले (लोकाः) समाज (इषम्) ज्ञान को और (ऊर्जम्) बल को (यजमानाय) यजमान [श्रेष्ठ कर्म करनेवाले] के लिये (दुह्राम्) भरपूर करें ॥४॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्म जीव और प्रकृतियह तीनों सब पदार्थों और सब लोकों में व्याप रहे हैं, मनुष्य सर्वनायक परमात्माके आश्रय से उनके तत्त्व को जानकर आनन्द पावें ॥४॥इस मन्त्र का मिलान करो (द्वासुपर्णा सयुजा....) अ० ९।९।२० तथा ऋग्वेद−१।१६४।२० ॥