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अ॑पू॒पवा॑न्क्षी॒रवां॑श्च॒रुरेह सी॑दतु। लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ येदे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अपूपऽवान् । क्षीरऽवान् । चरु: । आ । इह । सीदतु । लोकऽकृत: । पथिऽकृत: । यजामहे । ये । देवानाम् । हुतऽभागा: । इह । स्थ ॥ ४.१६॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:16


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

यजमान के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अपूपवान्) अपूपों [शुद्ध पके हुए भोजनों मालपूए पूड़ी आदि]वाला, (क्षीरवान्) दूधवाला (चरुः)चरु [स्थालीपाक] (इह) यहाँ [वेदी पर] (आ सीदतु) आवे। (लोककृतः) समाजों केकरनेवाले, (पथिकृतः) मार्गों के बनानेवाले [तुम लोगों] को (यजामहे) हम पूजतेहैं, (ये) जो तुम (देवानाम्) विद्वानों के बीच (हुतभागाः) भाग लेनेवाले (इह)यहाँ पर (स्थ) हो ॥१६॥
भावार्थभाषाः - यजमान को योग्य है किविद्वानों को सत्कारपूर्वक बुलाकर शुद्ध, सुगन्धित, पुष्टिकारक मोहनभोगमालपूए आदि पदार्थों के स्थालीपाक से यज्ञ करे ॥१६॥इस मन्त्र का उत्तर भाग आचुका है-अ० १८।३।२५-३५ ॥
टिप्पणी: १६−(अपूपवान्) पानीविशिभ्यः पः। उ० ३।२३। नञ्+पूयीविशरणे दुर्गन्धे च-प प्रत्ययः, यलोपः। सुसंस्कृतभोजनपदार्थयुक्तः (क्षीरवान्)दुग्धवान् (चरुः) भृमृशीङ्तॄचरि०। उ० १।७। चर गतिभक्षणयोः-उ प्रत्ययः।चरुर्मृच्चयो भवति चरतेर्वा समुच्चरन्त्यस्मादापः-निरु० ६।११। चरुर्मेघनाम-निघ०१।१०। यज्ञपाकः (इह) अत्र वेद्याम् (आ सीदतु) आ गच्छतु। तिष्ठतु। अन्यत्पूर्ववत्-अ० १८।३।२५ ॥