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प्र च्य॑वस्वत॒न्वं सं भ॑रस्व॒ मा ते॒ गात्रा॒ वि हा॑यि॒ मो शरी॑रम्। मनो॒निवि॑ष्टमनु॒संवि॑शस्व॒ यत्र॒ भूमे॑र्जु॒षसे॒ तत्र॑ गच्छ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । च्यवस्व । तन्वम् । सम् । भरस्व । मा । ते । गात्रा । वि । हायि । मो इति । शरीरम् । मन: । निऽविष्टम् । अनुऽसंविशस्व । यत्र । भूमे: । जुषसे । तत्र । गच्छ ॥३.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:9


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

उन्नति करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे विद्वान् !] (तन्वम्) [अपने] शरीर को (प्र) आगे (च्यवस्व) चला और (सम्) मिलकर (भरस्व) पोषणकर, [जिस से] (मा) न तो (ते) तेरे (गात्रा) अङ्ग (मो) और न (शरीरम्) [तेरा] शरीर (वि) विचल होकर (हायि) छूटे। (निविष्टम्) जमे हुए (मनः) मन के (अनुसंविशस्व)पीछे-पीछे प्रवेश कर, और (यत्र) जहाँ (भूमेः) भूमि की (जुषसे) तू प्रीति करताहै, (तत्र) वहाँ (गच्छ) जा ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अपने शरीर सेसदा उद्योग करके सबके पोषण में अपनी शरीररक्षा करे और दृढ़ संकल्पी होकर आगेबढ़ता हुआ दुष्टों से शिष्टों की रक्षा करे ॥९॥
टिप्पणी: ९−(प्र) प्रकर्षेण। अग्रे (च्यवस्व) च्यावय। गमय (तन्वम्) शरीरम् (सम्) संगत्य (भरस्व) पोषय (मा) निषेधे (ते) तव (गात्रा) ....... त्यक्तं भवेत् (मो) नैव (शरीरम्) (मनः) चित्तम् (निविष्टम्) अवस्थितम् (अनुसंविशस्व) अनुसृत्य प्रविष्टो भव (यत्र) स्थाने (भूमेः) पृथिव्याः (जुषसे) प्रीतिं करोषि (तत्र) स्थाने (गच्छ) ॥