उदी॑र्ष्वनार्य॒भि जी॑वलो॒कं ग॒तासु॑मे॒तमुप॑ शेष॒ एहि॑। ह॑स्तग्रा॒भस्य॑ दधि॒षोस्तवे॒दंपत्यु॑र्जनि॒त्वम॒भि सं ब॑भूथ ॥
पद पाठ
उत् । ईर्ष्व । नारि । अभि । जीवऽलोकम् । गतऽअसुम् । एतम् । उप । शेषे । आ । इहि । हस्तऽग्राभस्य । दधिषो: । तव । इदम् । पत्यु: । जनिऽत्वम् । अभि । सम् । बभूथ ॥३.२॥
अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:2
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
नियोगविधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (नारि) हे नारी ! (जीवलोकम् अभि) जीवते पुरुषों के समाज की ओर (उत) उठकर (ईर्ष्व) चल, (एतम्) इस (गतासुम्) गये प्राणवाले [मरे वा रोगी पति] को (उप) सराहती हुई (शेषे) तू पड़ीहै, (आ इहि) आ (दधिषोः) वीर्यदाता [नियुक्त पति] से (ते) अपने (हस्तग्राभस्य) [विवाह में] हाथ पकड़नेवाले (पत्युः) पति के (जनित्वम्) सन्तान को (इदम्) अब (अभि) सब प्रकार (सम्) यथावत् [शास्त्रानुसार] (बभूथ) तू प्राप्त हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - विपत्ति काल मेंअर्थात् सन्तान न होने पर पति के बड़े रोगी होने वा मर जाने पर स्त्रीमृतस्त्रीक पुरुष से नियोग कर सन्तान उत्पन्न करके पति के वंश को चलावे। इसीप्रकार जिस पुरुष की स्त्री बड़ी रोगिनी हो वा मर गई हो, वह विधवा से नियोग करसन्तान उत्पन्न करके अपना वंश चलावे ॥२॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।१८।८, वहाँपर (दधिषोः) के स्थान पर (दिधिषोः) पद है और ऋग्वेदपाठ ही महर्षिदयानन्दकृतऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के और सत्यार्थप्रकाश चतुर्थ समुल्लास के नियोगविषयमें व्याख्यात है ॥मनुस्मृति अध्याय ९ श्लोक ५८ आदि में नियोगविषय का वर्णन है, यहाँ दो श्लोक लिखे जाते हैं−देवराद् वा सपिण्डाद् वा स्त्रिया सम्यङ्नियुक्तया। प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥१॥ विधवायां नियोगार्थेनिर्वृत्ते तु यथाविधि। गुरुवच्च स्नुषावच्च वर्तेयातां परस्परम् ॥२॥मनुस्मृतिअध्याय ९ श्लोक ५९, ६२ ॥देवर [पति के छोटे वा बड़े भाई] से अथवा सपिण्ड से [पति की छह पीढ़ियों के भीतरवालेसे] यथाविधि [पति आदि बड़े लोगों द्वारा] नियुक्त की हुई स्त्री को सन्तान केसर्वथा नाश होने पर यथेष्ट सन्तान उत्पन्न करनी चाहिये ॥१॥ विधवा [आदि] मेंनियोग का प्रयोजन यथाविधि पूरा हो जाने पर दोनों [पुरुष और स्त्री] गुरु के समानऔर पुत्र वधू के समान आपस में बर्ताव करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(उत्) उत्थाय (ईर्ष्व) गच्छ (नारि) म० १। हे स्त्रि (अभि) अभिलक्ष्य (जीवलोकम्) जीवितानां समाजम् (गतासुम्)विगतप्राणम्। मृतं रोगिणं वा (एतम्) दृश्यमानम् (उप) पूजायाम्। उपगच्छन्ती।स्तुवाना (शेषे) शीङ् स्वप्ने। भूमौ वर्तसे (एहि) आगच्छ (हस्तग्राभस्य) ग्रहउपादाने-कर्मण्यण्, हस्य भः। विवाहे गृहीतहस्तस्य (दधिषोः) दधातेर्द्वित्वमित्वंषुक् च। उ० ३।९७। इति दर्शनात्। कुर्भ्रश्च। उ० १।२२। दधातेः कु, इत्वंषुगागमश्च। दधिषुरेव दिधिषुः। नियुक्तायां स्त्रियां गर्भस्थापकात् पुरुषात् (तव) स्वकीयायाः (इदम्) इदानीम् (पत्युः) स्वामिनः (जनित्वम्) सन्तानम् (अभि)सर्वतः (सम्) सम्यक्। यथाविधि (बभूथ) भू सत्तायां प्राप्तौ च। छन्दसिलुङ्लङ्लिटः। पा० ३।४।६। लोडर्थे लिट्। बभूविथ। प्राप्नुहि ॥
