पितरों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हिरण्यपावाः) तेज [वासुवर्ण आदि धन] के रक्षक लोग (क्रतुम्) कर्म [वा बुद्धि] को (मधुना) विज्ञान केसाथ (अञ्जते) शुद्ध करते हैं, (वि अञ्जते) विख्यात करते हैं, (सम्) मिलकर (अञ्जते) प्राप्त करते हैं, (अभि अञ्जते) सब ओर फैलाते हैं और (रिहन्ति) सराहतेहैं। (सिन्धोः) समुद्र के (उच्छ्वासे) बढ़ाव में (पतयन्तम्) जाते हुए (उक्षणम्)वृद्धि करनेवाले (पशुम्) दृष्टिवाले प्राणी को (आसु) इन [प्रजाओं] के बीच (गृह्णते) गहते हैं [सहारा देते हैं] ॥१८॥
भावार्थभाषाः - प्रतापी, धनी, विज्ञानी, महात्मा पुरुष शुभ कर्मों और ज्ञानों को संसार में फैलावें और समुद्रवा आकाश आदि कठिन स्थानों में जानेवाले उद्योगी दृष्टिमान् पुरुषों को सब लोगोंके बीच सहाय करें ॥१८॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−९।८६।४३। और सामवेदमें है−पू० ६।७।११ तथा उ० ७।३।२१ ॥