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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इदम् इत्) यही [सर्वव्यापक ब्रह्म] (वै) निश्चय करके है, (उ) और (जरसि) स्तुति में (इतः) इस[ब्रह्म] से (अन्यत्) भिन्न (अपरम्) दूसरा कुछ भी (न) नहीं है।(इव) जैसे (जाया)सुख उत्पन्न करनेवाली पत्नी (पतिम्) पति को (वाससा) वस्त्र से, [वैसे] (भूमे) हेसर्वाधार परमेश्वर ! (एनम्) इस [जीव] को (अभि) सब ओर से (ऊर्णुहि) ढकले ॥५१॥
भावार्थभाषाः - वह अद्वितीयसर्वान्तर्यामी जगदीश्वर अपने उपासकों को अपनी कृपा से ऐसा प्रसन्न रखता है, जैसे पत्नी पति को वस्त्र आदि की सेवा से प्रसन्न रखती है ॥५१॥
टिप्पणी: ५१−(अपरम् अपरम्)अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते-निरु० १०।४२। अन्यत् किंचिदपि (जरसि) जॄस्तुतौ-असुन्। जरतिरर्चतिकर्मा-निघ० ३।१४। स्तुतौ (अन्यत्) (इतः) अस्मात्परब्रह्मणः (जाया) सुखोत्पादिका पत्नी (पतिम्) भर्तारम् (इव) यथा-अन्यत्पूर्ववत्-म० ५० ॥
