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इ॒दमिद्वा उ॒नाप॑रं दि॒वि प॑श्यसि॒ सूर्य॑म्। मा॒ता पु॒त्रं यथा॑ सि॒चाभ्येनं भूम ऊर्णुहि॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इदम् । इत् । वै । ऊं इति । न । अपरम् । दिवि । पश्यसि । सूर्यम् । माता । पुत्रम् । यथा । सिचा । अभि । एनम् । भूमे । ऊर्णुहि ॥२.५०॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:50


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा की उपासना का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे जीव !] (इदम् इत्)यही [सर्वव्यापक ब्रह्म] (वै) निश्चय करके है, (उ) और (अपरम्) दूसरा (न) नहींहै, तू (दिवि) ज्ञानप्रकाश में (सूर्यम्) सर्वप्रेरक परमात्मा को (पश्यसि)देखता है। (यथा) जैसे (माता) माता (पुत्रम्) पुत्र को (सिचा) अपने आँचल से, [वैसे] (भूमे) हे सर्वाधार परमेश्वर ! (एनम्) इस [जीव] को (अभि) सब ओर से (ऊर्णुहि) ढकले ॥५०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सर्वव्यापकहै, उसके समान और कोई नहीं है, वह ज्ञाननेत्र से दीखता है। वह अपने शरणागतभक्तों की इस प्रकार सर्वथा रक्षा करता है, जैसे माता अपने छोटे बच्चों कीवस्त्र आदि से रक्षा करती है ॥५०॥इस मन्त्र का उत्तरार्ध ऋग्वेद में है−१०।१८।११, और आगे है-अथर्व १८।३।५० ॥
टिप्पणी: ५०−(इदम्) दृश्यमानम्। सर्वव्यापकं ब्रह्म (इत्) एव (वै) निश्चयेन (उ) च (न) निषेधे (अपरम्) अन्यत् किंचित् (दिवि)ज्ञानप्रकाशे (पश्यसि) अवलोकयसि (सूर्यम्) सर्वप्रेरकं परमात्मानम् (माता) जननी (पुत्रम्) (यथा) येन प्रकारेण (सिचा) षिच क्षरणे-क्विप्। वस्त्रेण। चेलाञ्चलेन (अभि) सर्वतः (एनम्) जीवम् (भूमे) भवन्ति लोका यस्यां सा भूमिः परमेश्वरः। हेसर्वाधार परमात्मन् (ऊर्णुहि) आच्छादय। सर्वथा रक्ष ॥