0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पितरों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उदन्वती) थोड़ेजलवाली [नदी के समान] (अवमा) थोड़ी (द्यौः) प्रकाशमान विद्या है, (पीलुमती)फूलोंवाली [लता के समान] (मध्यमा इति) मध्यम विद्या है। (तृतीया) तीसरी (ह)निश्चय करके (प्रद्यौः इति) बड़े प्रकाशवाली [विद्या] है, (यस्याम्) जिस [बड़ीविद्या] में (पितरः) पितर [रक्षक महात्मा लोग] (आसते) ठहरते हैं ॥४८॥
भावार्थभाषाः - छोटे विद्वान् छोटीनदी के समान, मध्यम विद्वान् केवल फलवाली लता के समान बाहिर से शोभायमान होतेहैं, परन्तु पूर्ण विद्या प्राप्त करके सर्वोपकारी हो पितर अर्थात् पालनकर्ताकहाते हैं ॥४८॥
टिप्पणी: ४८−(उदन्वती) उदन्वानुदधौ च। पा० ८।२।१३। उदकस्य उदन् मतौ, निन्दायां मतुप्। अल्पजला नदी यथा (द्यौः) प्रकाशकर्मा विद्यादयानन्दभाष्ये, यजु० १८।१८। प्रकाशमाना विद्या (अवमा) अवद्यावमाधमार्वरेफाः कुत्सिते। उ० ५।५४।अव रक्षणगतिवधादिषु-अमप्रत्ययः। कुत्सिता। अल्पा (पीलुमती) मृगय्वादयश्च। उ०१।३७। पील रोधने-कु। द्रुमप्रभेदमातङ्गकाण्डपुष्पाणि पीलवः। अमरः २३।१९३।प्रसूनवती। पुष्पयुक्ता लता यथा (इति) पादपूरणे (मध्यमा) (तृतीया) (ह) निश्चयेन। (प्रद्यौः) प्रकर्षेण दीप्यमाना विद्या (इति) (यस्याम्) विद्यायाम् (पितरः)पालका महात्मानः (आसते) तिष्ठन्ति ॥
