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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मोक्ष के लिये प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मात्राम्) मात्रा [इसवेदोक्त मर्यादा] को (अमासि) मैं नापूँ, (स्वः) सुख (अगाम्) पाऊँ, और (आयुष्मान्)उत्तम जीवनवाला (भूयासम्) मैं हो जाऊँ। (यथा) क्योंकि (अपरम्) अन्य प्रकार से [उस मर्यादा को, कोई भी] (न) नहीं (मासातै) नाप सकता, (शते) शरत्सु) सौ वर्षोंमें भी (पुरा) लगातार (नो) कभी नहीं ॥४५॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक मनुष्य वेदविहित ईश्वरमर्यादा पर चल कर मोक्षसुख प्राप्त करे, वेदविमुख पुरुष सारे जीवनभर भी प्रयत्न करने पर ईश्वरनियम को नहीं हटा सकता ॥४५॥
टिप्पणी: ४५−(अमासि) माङ् मानेलिङर्थे लुङ्। अहं मासीय (मात्राम्) वेदोक्तमर्यादाम् (स्वः) सुखम् (अगाम्) इण्गतौ-लिङर्थे लुङ्। ईयासम्। प्राप्नुयाम् (आयुष्मान्) उत्तमजीवनयुक्तः (भूयासम्)अन्यत् पूर्ववत्-म० ३८ ॥
