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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मोक्ष के लिये प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इमाम्) इस [वेदोक्त] (मात्राम्) मात्रा [मर्यादा] को (सम्) सब प्रकार (मिमीमहे) हम नापते हैं, (यथा)क्योंकि (अपरम्) अन्य प्रकार से [उस मर्यादा को, कोई भी] (न) नहीं (मासातै) नापसकता। (शते शरत्सु) सौ वर्षों में भी (पुरा) लगातार (नो) कभी नहीं ॥४४॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र ३८ के समान॥४४॥
टिप्पणी: ४४−(सम्) सम्यक्। अन्यत् पूर्ववत्-म० ३८ ॥
