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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मोक्ष के लिये प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इमाम्) इस [वेदोक्त] (मात्राम्) मात्रा [मर्यादा] को (मिमीमहे) हम नपाते हैं, (यथा) क्योंकि (अपरम्)अन्य प्रकार से [उस मर्यादा को, कोई भी] (न) नहीं (मासातै) नाप सकता। (शतेशरत्सु) सौ वर्षों में भी (पुरा) लगातार (नो) कभी नहीं ॥३८॥
भावार्थभाषाः - सब प्राणी परमेश्वर कीही वेदोक्त आज्ञा में रहकर विवाह करते हैं, और चाहे कोई नास्तिक अपने जीवन भरअन्यथा प्रयत्न करे, तो भी परमेश्वर के नियम को नहीं टाल सकता ॥३८॥
टिप्पणी: ३८−(इमाम्)वेदोक्ताम् (मात्राम्) मर्यादाम् (मिमीमहे) माङ् माने। मानेन जानीमः (यथा)यस्मात् कारणात् (अपरम्) अन्यप्रकारेण (न) निषेधे (मासातै) माङ् माने-लेट्।मानेन जानीयात् (शते) (शरत्सु) जीवनसंवत्सरेषु (नो) नैव (पुरा) पुराप्रबन्धचिरातीतनिकटाऽऽगामिषुइत्यव्ययार्थः। प्रबन्धेन निरन्तरेण ॥
