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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
बल बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे विद्वान् !तू (शम्) शान्ति के लिये (तप) तप कर, [किसी को] (अति) अत्याचार से (मा तपः) मततपा और [किसी के] (तन्वम्) शरीर को [अत्याचार से] (मा तपः) मत तपा [मत सता]। (वनेषु) सेवनीय व्यवहारों में (ते) तेरा (शुष्मः) बल (अस्तु) होवे और (यत्) जो (हरः) [तेरा] तेज है, वह (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (अस्तु) होवे ॥३६॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् पुरुष संसारमें शान्ति फैलाने के लिये शम दम आदि तप करे और किसी को किसी प्रकार न सतावे। इसविधि से बल बढ़ा उत्तम-उत्तम पदार्थ प्राप्त करके पृथिवी पर प्रतापी होवे॥३६॥
टिप्पणी: ३६−(शम्) शान्तये (तप) शमदमादितपः कुरु (अति) अत्याचारेण (मा तपः) मा तापय।मा दुःखय कमपि (अग्ने) हे विद्वन् पुरुष (तन्वम्) कस्यचिदपि शरीरम् (मा तपः) मादुःखय (वनेषु) वन सेवने-अच्। सेवनीयव्यवहारेषु (शुष्मः) (अस्तु) (ते) तव (पृथिव्याम्) भूमौ (अस्तु) (यत्) (हरः) हरो हरतेः, ज्योतिर्हर उच्यते-निरु०४।१९। तेजः ॥
