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य॒माय॒ सोमः॑पवते य॒माय॑ क्रियते ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यमाय । सोम: । पवते । यमाय । क्रियते । हवि: । यमम् । ह । यज्ञ: । गच्छति । अग्निऽदूत: । अरम्ऽकृत: ॥२.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ईश्वर की भक्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यमाय) यम [सर्वनियन्ता परमात्मा] के लिये (सोमः) ऐश्वर्यवान् [जीवात्मा] (पवते) अपने कोशुद्ध करता है, (यमाय) यम [न्यायकारी ईश्वर] के लिये (हविः) भक्तिदान (क्रियते)किया जाता है (यमम्) यम [परमेश्वर] को (ह) ही (यज्ञः) संगतिवाला संसार (गच्छति)चलता है, [जैसे] (अरंकृतः) पर्याप्त किया हुआ (अग्निदूतः) अग्नि से तपाया हुआ [जल आदि रस ऊपर जाता है] ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य शुद्ध अन्तःकरणसे ईश्वरभक्ति करके ऐश्वर्यवान् होवें। वह परमात्मा इतना बड़ा है कि यह सबसंसार उसी की आज्ञा में चलता है, जैसे अग्नि के पूरे ताप से भाप ऊँचा उठता है॥१॥मन्त्र १-३ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−१०।१४।१३, १५, १४। ऋग्वेदपाठ महर्षिदयानन्दकृतसंस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण में उद्धृत है ॥
टिप्पणी: १−(यमाय)सर्वनियामकाय। न्यायकारिणे परमात्मने (सोमः) ऐश्वर्ययुक्तो जीवात्मा (पवते)आत्मानं शोधयति (यमाय) (क्रियते) अनुष्ठीयते (हविः) हु दानादानादनेषु-इसि।भक्तिदानम् (यमम्) परमेश्वरम् (ह) एव (यज्ञः) संयोगं प्राप्तः संसारः (गच्छति)प्राप्नोति (अग्निदूतः) टुदु उपतापे-क्त, दीर्घः। अग्निना परितापिता जलादिरसोयथा (अरंकृतः) पर्याप्तीकृतः ॥