भाई-बहिन के परस्पर विवाह के निषेध का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कः) कौन [पुरुष] (अस्य) इस [जगत्] के (प्रथमस्य) पहिले (अह्नः) दिन को (वेद) जानता है (कः) किसने (ईम्) इस [दिन] को (ददर्श) देखा है, (कः) कौन (इह) इस [विषय] में (प्र वोचत्)बोले। (मित्रस्य) सर्वप्रेरक (वरुणस्य) श्रेष्ठ परमेश्वर का (बृहत्) बड़ा (धाम)धाम [धारणसामर्थ्य वा नियम] है, (आहनः) हे चोट लगानेवाली ! (कत् उ) कैसे (वीच्या) छल के साथ (नॄन्) नरों [नेताओं] से (ब्रवः) तू बोल सके ॥७॥
भावार्थभाषाः - यह भी पुरुष का वचनहै। तू कहती है कि सूर्य और पृथिवी प्राकृतिक पदार्थों में भी पति-पत्नी भाव है, यह ठीक नहीं। परमेश्वर के नियम मनुष्य नहीं समझ सकता, जैसे सूर्य और पृथिवी मेंआकर्षण धारण आदि गुण हैं, जिनके कारण उनके बीच बारंबार आपस में वृष्टि देने औरलेने का सामर्थ्य है। तू हमें मत ठग ॥७॥मन्त्र ७-१२ कुछ अभेद वा भेद से ऋग्वेदमें हैं−१०।१०।६-११ ॥