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इ॒त ए॒तउ॒दारु॑हन्दि॒वस्पृ॒ष्ठान्यारु॑हन्। प्र भू॒र्जयो॒ यथा॑ प॒था द्यामङ्गि॑रसोय॒युः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इत: । एते । उत् । आ । अरुहन् । दिव: । पृष्ठानि । आ । अरुहन् । प्र । भू:ऽजय: । यथा । पथा । द्याम् । अङ्गिरस: । ययु: ॥१.६१॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:61


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

पितरों और सन्तानों के कर्त्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एते) यह [पितर लोग] (इतः) इस [सामान्य दशा] से (उत्) उत्तमता के साथ (आ अरुहन्) ऊँचे चढ़े हैं, और (दिवः) व्यवहार के (पृष्ठानि) पूछने योग्य स्थानों पर (आ अरुहन्) ऊँचे चढ़े हैं। (भूर्जयः यथा) भूमि जीतनेवालों के समान (पथा) सन्मार्ग से (अङ्गिरसः) विज्ञानीमहर्षि लोग (द्याम्) प्रकाश को (प्र) अच्छे प्रकार (ययुः) प्राप्त हुए हैं ॥६१॥
भावार्थभाषाः - बड़े-बड़े महात्माब्रह्मचर्य आदि तप के साथ विद्या ग्रहण करके सामान्य अवस्था से ऊँचे हुए हैं, इसी प्रकार सब मनुष्य परिश्रम और उद्योग करके सदा उन्नति करें ॥६१॥यह मन्त्र कुछभेद से सामवेद में है−पू० १।१०।२ ॥ इति प्रथमोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: ६१−(इतः) (अस्मात्)स्थानात्। सामान्यदशासकाशात् (एते) पितरः (उत्) उत्तमतया (आ अरुहन्) आरूढा अभवन् (दिवः) व्यवहारस्य (पृष्ठानि) प्रष्टव्यानि स्थानानि (आ अरुहन्) (प्र) प्रकर्षेण (भूर्जयः) भू सत्तायाम्-रुक्। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। जि जये-विच्।भूर्भुवो भूमेर्जेतारः (यथा) सादृश्ये (पथा) सन्मार्गेण (द्याम्) विद्याप्रकाशम् (अङ्गिरसः) महाविज्ञानिनः (ययुः) प्रापुः ॥