भाई-बहिन के परस्पर विवाह के निषेध का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कः) कर्ता [प्रजापति]परमेश्वर (अद्य) आज (ऋतस्य) सत्य के (गाः) गानेवाले, (शिमीवतः) उत्तम कर्मवाले, (भामिनः) तेजस्वी (दुर्हृणायून्) [शत्रुओं पर] भारी क्रोधवाले, (आसन्निषून्) ठीकस्थान पर बाण पहुँचानेवाले, (हृत्स्वसः) [शत्रुओं के] हृदयों में शस्त्र मारनेवालेऔर (मयोभून्) [धर्मात्माओं को] सुख देनेवाले वीरों को (धुरि) धुरी [भारी बोझ]में (युङ्क्ते) जोड़ता है, (यः) जो पुरुष (एषाम्) इन [वीरों] की (भृत्याम्) पोषणरीति को (ऋणधत्) बढ़ावेगा, (सः) वह (जीवात्) जीवेगा ॥६॥
भावार्थभाषाः - पुरुष का वचन है।परमात्मा धुरन्धर धर्मात्मा वीरों पर संसार की रक्षा का भार रखता है, और वे उसनियम का यथावत् पालन करते हैं। जो मनुष्य ऐसे मर्यादा पुरुषों की नीति पर चलताहै, वह संसार में यशस्वी होकर अमर होता है ॥६॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है, १।८४।६।महर्षि दयानन्द ने सेनापति के योग्य कर्म में इसकी व्याख्या की है ॥