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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पितरों और सन्तानों के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे पुत्र !] (द्युमन्तः) बड़े गतिवाले हम (त्वा) तुझे (इधीमहि) प्रकाशित करें, (द्युमन्तः)व्यवहारकुशल हम (सम्) एक होकर (इधीमहि) तेजस्वी करें। (द्युमान्) व्यवहारकुशलतू (द्युमतः) व्यवहारकुशल (पितॄन्) पितरों [रक्षक विद्वानों] को (हविषे) ग्रहणकरने योग्य भोजन (अत्तवे) खाने के लिये (आ वह) ले आ ॥५७॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र ५६ के समान है॥५७॥
टिप्पणी: ५७−(द्युमन्तः) दिवु द्युतिगतिव्यवहारेषु-विच्। ततो मतुप्। दिव उत्। पा०६।१।१३१। इत्युत्त्वम्। दीप्तिमन्तः। गतिमन्तः (द्युमन्तः) व्यवहारकुशलाः (द्युमान्) व्यवहारकुशलः (द्युमतः) व्यवहारकुशलान्। अन्यत् पूर्ववत्-म० ५६ ॥
