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उ॒शन्त॑स्त्वेधीमह्यु॒शन्तः॒ समि॑धीमहि। उ॒शन्नु॑श॒त आ व॑ह पि॒तॄन्ह॒विषे॒अत्त॑वे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उशन्त: । त्वा । इधीमहि । उशन्त: । सम् । इधीमहि । उशन् । उशत: । आ । वह । पितॄन् । हविषे । अत्तवे ॥१.५६॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:56


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

पितरों और सन्तानों के कर्त्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे ब्रह्मचारी !] (उशन्तः) कामना करते हुए हम (त्वा) तुझे (इधीमहि) प्रकाशित करें, (उशन्तः)अभिलाषा करते हुए हम (सम्) मिलकर (इधीमहि) तेजस्वी करें। (उशन्) कामना करता हुआतू (उशतः) कामना करते हुए (पितॄन्) पितरों [रक्षक जनों] को (हविषे) ग्रहण करनेयोग्य भोजन (अत्तवे) खाने के लिये (आ वह) ले आ ॥५६॥
भावार्थभाषाः - जैसे विद्वान् माता-पिता आदि बड़े लोग जितेन्द्रिय विद्वान् सभ्य सन्तान की कामना करें, वैसे हीसन्तान भी उन पितृजनों की सेवा करके गुण प्राप्त करें ॥५६॥यह मन्त्र कुछ भेद सेऋग्वेद में है−१०।१६।१२ और यजुर्वेद में ९।७०। और महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पितृयज्ञविषय में भी व्याख्यात हैं ॥
टिप्पणी: ५६−(उशन्तः) कामयमानाः (त्वा)त्वां ब्रह्मचारिणम् (इधीमहि) पियेम। तेजस्विनं कुर्याम (उशन्तः) (सम्) एकीभावे (इधीमहि)(उशन्) कामयमानः (उशतः) कामयमानान् (आ वह) आनय (पितॄन्) पालकान्।जनकादीन् (हविषे) द्वितीयार्थे चतुर्थी। हविः। ग्राह्यं भोजनम् (अत्तवे) अत्तुंभोक्तम् ॥