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त्वष्टा॑दुहि॒त्रे व॑ह॒तुं कृ॑णोति॒ तेने॒दं विश्वं॒ भुव॑नं॒ समे॑ति। य॒मस्य॑ मा॒ताप॑र्यु॒ह्यमा॑ना म॒हो जा॒या विव॑स्वतो ननाश ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वष्टा । दुहित्रे । वहतुम् । कृणोति । तेन । इदम् । विश्वम् । भुवनम् । सम् । एति । यमस्य । माता । परिऽउह्यमाना । मह: । जाया । विवस्वत: । ननाश ॥१.५३॥

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:53


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अज्ञान के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वष्टा) त्वष्टा [प्रकाशमान सूर्य] (दुहित्रे) दुहिता [पूर्ति करनेवाली उषा] का (वहतुम्) चलाना (कृणोति) करता है, (तेन) उस [चलने] के साथ (इदम्) यह (विश्वम्) सब (भुवनम्) जगत् (सम्) ठीक-ठीक (एति) चलता है। (यमस्य) यम [दिन] की (माता) माता [बनानेवाली], (महः) बड़े (विवस्वतः) प्रकाशमान सूर्य की (जाया) पत्नी रूप [रात्रि] (पर्युह्यमाना) सब ओर हटायी गयी (ननाश) छिप जाती है ॥५३॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य उषाअर्थात् प्रभातकिरणों को फैलाता जाता है, सब जगत् अपने-अपने कामों में चेष्टाकरता है, और जैसे-जैसे दिन चढ़ता जाता है, रात्रि का अन्धकार हटता जाता है, इसीप्रकार ज्ञानी पितर लोग अज्ञान हटाकर ज्ञान के प्रकाश से संसार को सुख पहुँचावें॥५३॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१७।१ ॥भगवान् यास्क मुनि ने निरुक्त१२।११ में व्याख्या की है−“त्वष्टा दुहिता का वहन [चलाना] करता है, यह सब भुवनठीक-ठीक चलता है और यह सब प्राणी सब ओर से आकर मिलते हैं, यम की माता सब ओर कोले जायी गयी छिप गयी। रात्रि सूर्य की [पत्नी] सूर्य के उदय होने पर छिप जातीहै ॥
टिप्पणी: ५३−(त्वष्टा) प्रकाशमानः सूर्यः (दुहित्रे) षष्ठ्यर्थे चतुर्थी। दुहितुः।प्रपूरयित्र्या उषसः (वहतुम्) वहनम्। चालनम्। (कृणोति) करोति (तेन) पूर्वोक्तेनकर्मणा गमनेन (इदम्) विश्वम् सर्वम् (भुवनम्) जगत् (सम्) सम्यक् (एति) गच्छति।चेष्टते (यमस्य) दिनस्य (माता) निर्मात्री। रात्रिः (पर्युह्यमाना) प्रकाशेनपर्य्युत्सार्यमाणा (महः) महतः (जाया) पत्नीरूपा रात्रिः (विवस्वतः)प्रकाशमानस्य सूर्यस्य (ननाश) लडर्थे-लिट्। नश्यति। अदृष्टा भवति ॥