वांछित मन्त्र चुनें

शव॑सा॒ ह्यसि॑श्रु॒तो वृ॑त्र॒हत्ये॑न वृत्र॒हा। म॒घैर्म॒घोनो॒ अति॑ शूर दाशसि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शवसा । हि । असि । श्रुत: । वृत्रऽहत्येन । वृत्रऽहा । मघै: । मघोन: । अति । शूर । दाशसि ॥१.३८।

अथर्ववेद » काण्ड:18» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:38


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के चुनाव का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (हि) क्योंकि, (शूर)हे शूर ! तू (शवसा) बल से (श्रुतः) विख्यात और (वृत्रहत्येन) दुष्टों के मारनेसे (वृत्रहा) दुष्टनाशक (असि) है, और (मघैः) धनों के कारण (मघोनः अति) धनवालोंसे बढ़कर (दाशसि) तू दान करता है ॥३८॥
भावार्थभाषाः - हे राजन् ! आप महाबली, शत्रुनाशक और सुपात्रों के लिये बहुत दान देनेवाले हैं, इन गुणों से हम आपकोराजा बनाते हैं ॥३८॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−८।२४।२ ॥
टिप्पणी: ३८−(शवसा) बलेन (हि)यस्मात् कारणात् (असि) (श्रुतः) विख्यातः (वृत्रहत्येन) शत्रुहननेन (वृत्रहा)दुष्टानां हन्ता (मघैः) धनैः (मघोनः) मघवतः। धनवतः पुरुषान् (अति) अतीत्य (शूर)हे वीर (दाशसि) ददासि ॥