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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के चुनाव का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हि) क्योंकि, (शूर)हे शूर ! तू (शवसा) बल से (श्रुतः) विख्यात और (वृत्रहत्येन) दुष्टों के मारनेसे (वृत्रहा) दुष्टनाशक (असि) है, और (मघैः) धनों के कारण (मघोनः अति) धनवालोंसे बढ़कर (दाशसि) तू दान करता है ॥३८॥
भावार्थभाषाः - हे राजन् ! आप महाबली, शत्रुनाशक और सुपात्रों के लिये बहुत दान देनेवाले हैं, इन गुणों से हम आपकोराजा बनाते हैं ॥३८॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−८।२४।२ ॥
टिप्पणी: ३८−(शवसा) बलेन (हि)यस्मात् कारणात् (असि) (श्रुतः) विख्यातः (वृत्रहत्येन) शत्रुहननेन (वृत्रहा)दुष्टानां हन्ता (मघैः) धनैः (मघोनः) मघवतः। धनवतः पुरुषान् (अति) अतीत्य (शूर)हे वीर (दाशसि) ददासि ॥
