0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के चुनाव का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सखायः) हे मित्रो ! (वज्रिणे) वज्र [अस्त्र-शस्त्र] रखनेवाले, (नृतमाय) बहुत बड़े नेता, (धृष्णवे)साहसी (इन्द्राय) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] को (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञान (स्तुषे) स्तुति करने के लिये (उ) अवश्य (सु) भले प्रकार (आ शिषामहे) हम निवेदनकरें ॥३७॥
भावार्थभाषाः - सब विद्वान् लोगमहागुणी, नीतिज्ञ पुरुषार्थी मनुष्य को राजसिंहासन पर विराजने के लिये निवेदनकरें ॥३७॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−८।२४।१ और सामवेद में पू० ४।१०।१०॥
टिप्पणी: ३७−(सखायः) हे सुहृदः (आशिषामहे) आङःशासु इच्छायाम्, लेटि, आडागमः। शासइदङ्हलोः। पा० ६।४।३४। इति इत्वं छान्दसम्। शासिवसिघसीनां च। पा० ८।३।६०। इतिषत्वम्। इच्छेम। निवेदयेम (ब्रह्म) बृहत् तत्त्वज्ञानम् (इन्द्राय)परमैश्वर्यवते जनाय (वज्रिणे) अस्त्रशस्त्रधारिणे (स्तुषे) तुमर्थेसेसेनसेसेन्क्से०। पा० ३।४।९। ष्टुञ् स्तुतौ−क्से। स्तोतुम् (उ) एव (सु) सुष्ठु (नृतमाय) नेतृतमाय (धृष्णवे) प्रगल्भाय। साहसिने ॥
